असम के तिनसुकिया शहर से नेशनल हाईवे
37 पर महज 63 किलोमीटर आगे बढ़ने पर देश का सबसे लंबा ब्रिज धोला-सदिया पुल
आ जाता है. अभी हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां आकर इस पुल
का उद्घाटन किया था जिसका नाम भूपेन हज़ारिका सेतु रखा गया है.
इस
पुल के बिलकुल पास बाईं तरफ प्रधानमंत्री के हेलीकॉप्टर को उतारने के लिए बनाया गया हेलीपैड शनिवार को हो रही बारिश में धुलकर चमकने लगा था. इस जगह
से महज पांच सौ मीटर दूरी पर बसा है बीशोनिमुख खेरबाड़ी गांव, जहां के कई
घरों से रुक -रुक कर रोने-बिलखने की आवाजे सुनाई पड़ रही थीं.गांव में घुसते ही हाथ में आधुनिक राइफल लिए असम पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान दिखे. वो जिस कदर चौकन्ने खड़े दिखे, उससे साफ़ पता चल रहा था कि इस इलाके में कोई बड़ी वारदात हुई है.
दरअसल ये वही गांव है जहां पिछले गुरुवार की शांम करीब साढ़े सात बजे अज्ञात हमलावरों ने बंगाली मूल के पांच लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी थी. तब से यहां सरकार के मंत्रियों, पुलिस अधिकारियों, मीडिया के लोगों और विभिन्न नागरिक संगठनों के नेताओं का आना-जाना लगा है.
थोड़ी दूर आगे एक छोटे से नाले पर बने लोहे के पुल को पार करने के बाद पहला मकान छोड़कर जैसे ही मैं बांस और टीन की छत वाले दूसरे मकान के अंदर गया, वहां दरवाजे के बाहर जमींन पर एक महिला अपनी दो साल की बच्ची को छाती से चिपकाए बिलकुल गुमसुम बैठी हुई थी.
पास खड़ी एक दूसरी महिला से पूछने पर पता चला कि ये कोई और नहीं बल्कि गोलीबारी की घटना में मारे गए 22 साल के अविनाश बिस्वास की पत्नी उर्मिला है.
पति के बारे में पूछने पर वो चीख-चीख कर रोने लगती है. उर्मिला की शादी को केवल तीन साल ही हुए थे. उर्मिला के परिवार में तीन लोगों की हत्या की गई है.
हमलावर अविनाश के साथ 18 साल के छोटे भाई अनंत और 55 साल के चाचा श्यामलाल बिश्वास को घर से बुलाकर ले गए थे और बाद में उनकी हत्या कर दी.
हमले वाली शाम का जिक्र करते हुए उम्रिला ने बीबीसी को बताया, "मेरे पति और देवर खेत में काम करके घर लौटे थे और शाम को खेत से लाई सब्जियों को टोकरियों मे डालते हुए दोस्तों के साथ गप्पें लड़ा रहे थे. उस समय पड़ोस में रहने वाले धनंजय और सहदेब भी हमारे घर आए हुए थे. मैं घर के आंगन में बैठकर बर्तन धो रही थी. इसलिए मैंने कुछ समय के लिए अपनी बेटी को पति की गोद में दे दिया."
अपनी बात पूरी करने से पहले उर्मिला भावुक हो जाती हैं.
वो रोते हुए बताती हैं, "कुछ लोग सेना की वर्दी पहने हमारे घर में घुस आए. मैं जबतक कुछ सोच पाती वो मेरे पति, देवर और उनके दोनों दोस्तों को अपने साथ ले गए. जब मैं उनके पीछे गई तो उन लोगों ने मुझे धमकाया और कहा कि कुछ देर बाद छोड़ देगें. बेटी को मेरी गोद मे देते हुए पति ने कहा था चिंता मत करों मैं अभी आ रहा हूं. ये शब्द मैने अनके मुंह से आखरी बार सुना था. वे अब कभी नही आएंगे. हमलावरों ने मेरे बेगुनाह पति का शरीर गोलियों से छलनी कर दिया."
अपनी दो साल की बेटी के माथे पर हाथ फेरती हुई उर्मिला उससे कहती है,"सुनु (बेटी का नाम) अब तुमको प्यार करने के लिए पापा कभी नहीं आएंगे." उर्मिला और उसका पूरा परिवार चाहता है कि हमलावरों को कड़ी से कड़ी सजा मिले.
अपने छोटे भाई और दो बेटों को खो चुके 65 साल के मोहनलाल बिश्वास दुख में पूरी तरह टूट चुके हैं.
धीमी आवाज में वो कहते है,"मैंने अपने दो जवान बेटे और छोटे भाई को खोया है. आखिर हमारा कसूर क्या था? मेरे दोनों बेटे खेतों में काम करके हमारे परिवार की देखभाल कर रहे थे. अब हम बूढ़े पति-पत्नी का ख्याल कौन रखेगा. अविनाश तो चला गया. अब उसकी दो साल की बेटी और पत्नि की देखभाल कौन करेगा?"
मोहनलाल का परिवार करीब चार दशक पहले असम के नगांव जिले से आकर तिनसुकिया जिले के बीशोनिमुख खेरबाड़ी गांव में बस गया था.
वो पुरानी बातों को याद करते हुए कहते है,"हमें इस गांव में रहते हुए सालों गुजर गए लेकिन इस तरह की घटना कभी किसी के साथ नहीं हुई. हमारी ना किसी के साथ कोई दुश्मनी है और न ही किसी ने हमें पहले कभी धमकाया है."
अपने दोनों बेटों को याद करते हुए मोहनलाल कहते है,"आप सोच सकते है, मेरे दो जवान बेटों की एकसाथ हत्या हुई है. छोटे भाई को मार दिया गया. बेटों के गम में पत्नी की दिमागी हालत बिगड़ चुकी है. रात को नींद नहीं आती है. भूख मर चुकी है. घटना के तीन दिन बाद भी किसी ने कुछ नहीं खाया है. मैं गरीब और कमजोर हूं. दोषियों को कहां सजा दिला पाऊंगा. आप लोग ही मेरे बेटों के हत्यारों को उचित सजा दिलवा सकते है."
मोहनलाल की पत्नि शामोली बिश्वास अपने बटों की लाश को देखने के बाद से सदमे में हैं.
आंगन में बने छोटे से पूजा घर को दिखाती हुई कहती है,"मेरे दोनों बेटे मर गए. इस बार विश्वकर्मा पूजा आप लोगों को करना होगा."
इतना कहने के बाद वो फिर चुप हो जाती है.
बीशोनिमुख खेरबाड़ी गांव में हिंदू बंगालियों के करीब ढाई सौ घर है. अगर एक-दो घर को छोड़ दे तो यहां बसे सभी लोग अनुसूचित जाति के हैं, जो सालों तक ब्रह्मपुत्र नदी से मछलियां पकड़कर अपना गुजारा कर रहे थे. बाद में बाढ़ के कारण जब मछलियां पकड़ने का काम बंद हो गया तो ये लोग खेती में लग गए. यहां के लोग आर्थिक रूप से काफी पिछड़े हैं.
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