Monday, September 24, 2018

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

पर्रिकर को  सितंबर को दिल्ली के एम्स में भर्ती किया गया था. पर्रिकर ने ख़ुद ही सीएम पद पर बने रहने में असमर्थता जताई थी. गोवा में बीजेपी नेतृत्व के संकट से जूझ रही है. पर्रिकर के अलावा दो और मंत्री फ़्रांसिस डिसुज़ा और पांडुरंग मदकाइकर भी बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती हैं.
समाजवादी पार्टी पूर्व प्रमुख और वर्तमान प्रमुख अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह अपने बेटे की एक रैली में शामिल हुए. इस रैली में अखिलेश, मुलायम और रामगोपाल यादव एक मंच पर दिखे. हाल ही में मुलायम सिंह के भाई शिवपाल यादव ने समाजवादी सेक्युलर मोर्चा बनाया था और
 में मुलायम सिंह यादव के परिवार में आई दरार के बाद पहली बार मुलायम सिंह, अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव एक मंच पर दिखे. 2016 में राज्य विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच मतभेद खुलकर सामने आए थे.
उन्होंने मुलायम के समर्थन का दावा किया था.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा है कि भारत बातचीत की पेशकश को पाकिस्तान की कमज़ोरी ना समझे. इमरान ने कहा है कि पाकिस्तान के बातचीत के प्रस्ताव को ठुकराकर भारत ने अपनी अकड़ का ही परिचय दिया है.
ख़ान ने कहा, ''मुझे उम्मीद है कि भारतीय नेतृत्व अपने अहम को कम करेगा और बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी. बातचीत के प्रस्ताव को कमज़ोरी के तौर पर नहीं देखना चाहिए क्योंकि दोनों देशों के बीच अमन से ही ग़रीबी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी जा सकती है.''
ख़ान ने कहा कि पाकिस्तान इस मामले में किसी भी तरह के दबाव के सामने नहीं झुकेगा. भारत ने नियंत्रण रेखा पर बीएसएफ़ के एक जवान के सिरकलम के बाद न्यूयॉर्क में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की प्रस्तावित बैठक को रद्द करने का फ़ैसला किया है.
संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी राजदूत निकी हेली ने ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी पर बेहद तल्ख़ टिप्पणियां कीं. उन्होंने कहा कि रूहानी को शनिवार को सैन्य परेड के दौरान हुए हमले लिए अमरीका को ज़िम्मेदार ठहराने के बजाय 'ख़ुद को आईने में देखना चाहिए.'
उन्होंने कहा, ''हसन रूहानी ख़ूब बढ़-चढ़कर बातें कर रहे हैं. अमरीका इस तरह किए गए किसी भी आतंकी हमले की निंदा करता है, चाहे वो कहीं भी हो. मुझे लगता है कि रूहानी को अपने भीतर झांकना चाहिए. ईरान में लोग उनके ही ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं, वो लंबे वक़्त से अपने ही लोगों का दमन करते आ रहे हैं. ईरानी लोगों ने बहुत कुछ बर्दाश्त कर लिया है. लेकिन फिर भी वो चाहें तो हमें इन सब चीज़ों के लिए ज़िम्मेदार ठहरा सकते हैं. उन्हें ख़ुद को आईने में देखना चाहिए.''
लगता है दोनों ओर के नेतृत्व के दरम्यान ये साबित करने की होड़ लगी हुई है कि कौन कितना बड़ा ड्रामेबाज़ है?
पर अब ये स्क्रिप्ट भी फ़टीचर होती जा रहा है कि पहले अच्छी-अच्छी बातें करो फिर अचानक गालम-गलोच पर उतर आओ.
उसके बाद कुछ दिनों के लिए ख़ामोश हो जाओ और फिर अच्छी-अच्छी बातें शुरु कर दो. ये फ़ॉर्मूला इतना फ़िल्मी हो चुका है कि जब भी भारत और पाकिस्तान की तरफ़ से कोई एक दूसरे के लिए अच्छी बात निकालता है तो दिल डूबने लगता है कि ख़ुदा न करे आगे कुछ बुरा होने वाला है.र एपिसोड में भरे बाज़ार में एक-दूसरे को जूता दिखाने का हर बार वही पुराना अंदाज़ गोपाल फ़ेरीवाले से लेकर असलम नाई तक सबको रट चुका है. भगवान के लिए और कुछ नहीं तो स्क्रिप्ट में ही कुछ बदलाव ले आओ, कोई सीन ही ऊपर नीचे कर दो.
मसलन यही कर लो कि अगर दिल्ली या इस्लामाबाद में से कोई एक कहे कि आओ सखी वार्तालाप-वार्तालाप खेलें तो सामने वाला इंकार न करे बल्कि आमने-सामने बैठकर आहिस्ता से मुस्कुराते हुए दूसरे को कुछ ऐसी गंदी बात कह दे कि अगले के कान और मुंह आग बबूला हो जाएं. और जब वो गुस्से में उठकर वॉक आउट करे तो दूसरा देश हैरत से पूछे क्या हुआ? कहां जा रहे हैं हुज़ूर? बातचीत का शौक पूरा हो गया क्या?
इससे दो फ़ायदें होंगे, बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी. और दुनिया के सामने ये भी कहा जा सकेगा कि मैं तो बातचीत करना चाहता हूं लेकिन ये नहीं करना चाहता. पहले मिलने पर राज़ी हो जाना और फिर कोई पुरानी बात अचानक याद आ जाने पर मिलने से इंकार कर देना और फिर हाथ लंबे कर-करके एक दूसरे को कोसना.
ये बच्चों और पतियों को स्कूल और काम पर भेजकर पिछली गली में खुलने वाले दरवाज़ों पर खड़ी पड़ोसनों को तो जंचता है लेकिन पड़ोसी देशों को बिलकुल नहीं जमता.
भले ही अंदर से कोई देश दूसरे के बारे में कितना क़मीना क्यों ना हो. ज के ज़माने में वैसे भी मार्केटिंग ही सबकुछ है. छूरी भी मारना हो तो ऐसे मुस्कुरा कर सफ़ाई से मारिए कि देखने वालों को पता ही न चले कि कब मार दी.
कुछ वक़्त तक जब भारत और पाकिस्तान एक दूसरे पर गुर्राते थे तो रूसी और अमरीकी उन्हें ठंडा करने के लिए दिल्ली और इस्लामाबाद की ओर दौड़ पड़ते थे.
अब तक मुझ जैसों को ये पता था कि भारत के बारे में पाकिस्तान की पॉलिसी फ़ौज तय करती है.
पर भारत की ओर से इस बार जिस लहजे में पाकिस्तान को झाड़ा जा रहा है उससे न जाने क्यों लगता है कि जैसे दिल्ली की नई पाकिस्तान पॉलिसी सुषमा स्वराज या अजीत डोभाल ने नहीं बल्कि अर्नब गोस्वामी ने बनाई है.
शाबाश! ऐसे ही लगे रहो ताकि दुनिया का मन लगा रहे.